तुर्की की सरकारी समाचार एजेंसी अनादुलु का आरोप है कि लंदन में मौजूद कुछ संस्थाएं तुर्की की करेंसी के ख़िलाफ़ साज़िश कर रही हैं जिसकी वजह से लीरे की क़ीमत में इतनी तेज़ी से गिरावट आ रही है। तुर्क राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान के दामाद और देश के वित्त मंत्री बैरात अलबैरक़ ने निवेशकों को आश्वासन दिलाया कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार में होने वाली कमी के बावजूद सरकार निवेशकों को नुक़सान नहीं पहुंचने देगी। तुर्की के विदेशी मुद्रा भंडार में हालिया हफ़्तों के दौरान 15 अरब डालर की कमी हुई है और अब यह केवल 25 अरब डालर बचा है।
विशेषज्ञ यह कहते हैं कि तुर्की इस समय सीरिया और लीबिया में दो युद्ध लड़ रहा है और इसका नतीजा यह है कि उसकी धरती पर 50 लाख सीरियाई शरणार्थी मौजूद हैं। पश्चिमी देशों के साथ तुर्की के मतभेद बहुत बढ़ गई है जबकि पड़ोसी देशों के साथ भी तुर्क सरकार के संबंध ख़राब हो चुके हैं। तुर्की ने अमरीका और रूस के बीच बैलेंस बनाकर अपनी रणनीति आगे ले जाने की योजना बनाई थी लेकिन लगता है कि दोनों ताक़तों से तुर्की के संबंध अनिश्चय का शिकार हो गए हैं। यही नहीं तुर्की की सत्ताधारी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी के भीतर भी मतभेद पैदा हो गए हैं। इन सारी चीज़ों ने तुर्की की अर्थ व्यवस्था पर बुरा असर डाला है। कोरोना वायरस की महामारी भी अपनी जगह मौजूद ही है।
2018 में भी तुर्की का लीरा बुरी तरह नीचे गिरा था तो क़तर ने तुर्की की अर्थ व्यवस्था में 15 अरब डालर इंजेक्ट करके तुर्की की करेंसी की मदद की थी साथ ही अमरीकी पादरी एंड्रूय ब्रान्सन को रिहा करके अर्दोग़ान ने अमरीका का दबाव भी कम करवा लिया था मगर यह साफ़ नहीं है कि इस बार क़तर तुर्की की मदद कर पाएगा या नहीं क्योंकि क़तर ख़ुद भी कोरोना वायरस और तेल की क़ीमतों में गिरावट की वजह से आर्थिक संकट में फंसा हुआ है।
स्रोतः रायुल यौम